#Gazal by Rajesh Gupta Badal

एक मतला तीन शेर

जाने कहां कहां से अब वो निशाने निकल आए,
उठाने को उंगली कितने बहाने निकल आए।

मैं नहीं भूला भूल वो गये कसमें निभाने को,
भूले हुए भी आज सब हैं तराने निकल आए।

चुभाते हैं नश्तर आज अपने देख देख कर के,
देख कर जख्म मेरे तो दिल दुखाने निकल आए।

दर्द पर जिनके बहाये मैंने आंसु दिन रात हैं,
मेरे अश्कों पर वही तो खिलखिलाने निकल आए।

राजेश गुप्ता ‘बादल’

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