#Gazal by Rambali Gupta

ग़ज़ल – 22 22 22 22

जब जलना स्वीकार करोगे,

दीपक सा उजियार करोगे।।

 

स्नेह-समर्पण शस्त्र अगर हों,

हर दिल पर अधिकार करोगे।

 

दुर्ग दिलों के जीत सके तो,

विजित सकल संसार करोगे।

 

भजन नही जनसेवा से ही,

जन्म यहाँ साकार करोगे।

 

दिल में द्वेष-दंभ का दानव,

उसका कब संहार करोगे?

 

राष्ट्र हितों पर मिट न सके तो,

जीवन यह बेकार करोगे।

 

दिल पर रख कर हाथ बता दो,

“हमसे कितना प्यार करोगे?”

 

दृष्टि पार्थ सम रक्खोगे यदि,

वार लक्ष्य के पार करोगे।

 

मिटा सके निज उर का तम तो,

‘स्व’ का साक्षात्कार करोगे।।

 

‘बली’ अचल-तल भी डिग सकता,

चोट जो’ बारम्बार करोगे।।  – रचना-रामबली गुप्ता

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