#Gazal by Ramesh Raj

रुक्न के अनुसार हू-ब-हू, बिना मात्रा गिराए एक ग़ज़ल

बहर-मुतफायलुन मुतफायलुन मुतफायलुन मुतफायलुन

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अब प्रान पर, मुसकान पर, पहचान पर, ग़म का असर

सुन यार मत, इस बात पर, बन बे-असर, नित बे-खबर |

 

तुझसे मिलन, गर हो सजन, महकें सुमन, तब रात-भर

खिलते कमल, कब आजकल, हम हैं विकल, अति नैन तर |

 

नित प्रीति पर, रति-रीति पर, सत नीति पर, चल ऐ सनम

तन रेत-सम, मन रेत-सम, अब मेघ बन, जल दे इधर |

 

मत दूर रह, बन नूर रह, दिल के निकट, कमला नयन

कुछ बात कर, दिन-रात कर, मत घात कर, कल-नाद कर |

 

छिड़के नमक, रुख की तमक, मत यूं दहक, अब आग बन

तिरछी नज़र, नित वाण-सम, करती सितम, इस ‘राज’ पर |

+रमेशराज

 

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