#Gazal by Rekha Maurya

भीड़ बहुत है ख्याबो के मेले में एक तो आधार चाहिए;

दवाये काम नही करती यूँ मुझपे दुआये अपार चाहिए;

 

कोई  सहारा नही  देने वाला डूबते हुए पतंगे को यँहा;

झट से थामें जीवन की नईया ऐसी तो पतवार चाहिए;

 

दीमक लगती जा रही अब हर एक इंसान की सोच में;

कोई तो कँही पर परिवर्तन करे ऐसी तो कगार चाहिए;

 

कुछ तो बदलाव नही हुआ है अभी स्त्री की स्थिति में;

सतयुग हो  या  कलयुग क्षण मात्र अब सुधार चाहिए;

 

भटकते रहते बहुत से हमसफ़र भी तन्हाई की राहों में;

गले से कोई उनको लगाये ऐसा तो जाँ निशार चाहिए;

 

किनारें तो हर बहती दरिया में ही दिखते रहेंगे सबकों;

मिल जाये किनारें ख़ुद  नाव से ऐसा मझधार चाहिए;

 

बे वजूली के रिश्तों को बनाये बैठे है जो लोग हरघड़ी;

उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ दिलों में दिखती तकरार चाहिए ;

 

मूर्ति  पत्थरों की काम नही करती किसी भी मंदिर में;

बेज़ार को भी एक बार तो सच्चे मन से पुकार चाहिए;

 

नेताओं की तो झड़ी पर झड़ी ही लगी है राजनीति में;

खोखले नही करें जो अटूट वादे ऐसी सरकार चाहिए !!

!! रेखा मौर्या !!

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