#Gazal by Rifat Shaheen

इक लुत्फ की शमआ को जलाए हुए से हम

पढ़ते हैं चुपके चुपके तेरा ख़त लिखा हुआ

धड़कन तमाम रात मेरे साथ ही जगी

कितना हसीन ख्वाब का ये रतजगा हुआ

देखो तो एक बार हमें मुस्कुरा के तुम

आ जायेगा तड़प के ये दरिया थमा हुआ

बसने लगें हैं दिल के वीरानों में आप अब

ये दिल कहाँ रहा ये घर आपका हुआ

अपनो ने मेरे साथ निभाई वफ़ा भी ख़ूब

दारोरसन के साथ मुझे अलविदा कहा

चल मेरे हमनफस के मिरे थक गए क़दम

रिफ़अत का है नसीब जो ये आबला हुआ

 

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