#Gazal by Rifat Shaheen

मेरे वजूद के खंडहर में एक भटकी रूह

सवाल करती है हर पल सवाल करती है

बता के कौन है तू किस जहां की बासी है

ये ख़ुश्क लब ये बिखरी लटें ये आहों फुगा

सितारे हैं के पलकों पे ठहरे आँसू हैं

तेरे वजूद से ये किसने जान खैंची है

किताबी चेहरे पे मुर्दा सी क्यों उदासी है

किसे तलाशती फिरती है रात दिन आख़िर

किसे पुकारती फिरती है रात दिन आख़िर

तेरी तलाश का हासिल है कौन कुछ तो बता

बता ए रूहे परीशां बता के कुछ तो बता

मैं क्या कहूँ के मेरे लब पे कुफ़्ल ठहरा है

मेरी मज़ारे तमन्ना पे ग़म का पहरा है

मेरा नसीब भटकना है सो भटकती हूँ

है  पाव छालों से पुर फिर भी चलती रहती हूं

कहीँ से आये कोई जुगनू रोशनी के लिये

कोई तो शमआ जलाये भी रोशनी के लिये

कोई ये कह दे रिफ़अत रोक ले क़दम अपने

मेरी वफ़ाओं की बाहें पुकारती हैं तुम्हें

बस एक लफ़्ज़े मुहब्बत की आस में कब से

भटकती फिरती हूँ अपने ही दिल के खंडहर में

 

 

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