# Gazal By Rifat Shaheen

थक गई हूँ इक ठिकाना चाहती हूँ

दिल मे उसके घर बनाना चाहती हूँ

आज फिर तनहाइयाँ डसने लगीं हैं

बाजुओं का आस्ताना चाहती हूँ

इक सितारा टूटता देखा,दुआ में

हाथ अपने मैं उठाना चाहती हूँ

सुबह की तफ़्सीर अब लिक्खूं कहाँ तक

अब क़ससे शब सुनाना चाहती हूँ

वस्ल का वादा है रिफ़अत आज उनसे

आज मौसम  फिर सुहाना चाहती हूँ

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