#Gazal by Rifat Shaheen

ज़मी के चाँद जैसा है तुम्हारे हाँथ का कंगन

फ़लक प रोज़ उगता है तुम्हारे हाँथ का कंगन

ये वो कंगन है जो बाजार में मिलता नही जाना

इसे दिल ही बनाता है तुम्हारे हाँथ का कंगन

तेरी उंगली मेरे बालों को हौले से जो छूती है

खनक कर गुल मचाता है तुम्हारे हाँथ के कंगन

कभी रातों की खामोशी में सरगम छेड़ देता है

कभी सुब्ह बन जगाता है तुम्हारे हाँथ का कंगन

मेरी तक़दीर रहती है इसी कंगन के नक्शे में

मुझे मुझसे मिलाता है तुम्हारे हाँथ का कंगन

मैं मर जाऊं तो मेरी क़ब्र में इसको भी रख देना

के कितना जगमगाता है तुम्हारे हाँथ का कंगन

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