#Gazal by Rifat Shaheen

सुन ज़रा पास आ और ठहर ज़िन्दगी

पी रही हूँ मैं कितना ज़हर ज़िन्दगी

 

बेवफाई का शिकवा तो था मौत से

और तन्हां गई छोड़ कर ज़िन्दगी

 

रात थी लम्स था,मैं भी थी,वो भी था

हो गई एक शब में बसर ज़िन्दगी

 

दीद भी हो गई ईद भी हो गई

और हुई चाँद सी मुख़्तसर ज़िन्दगी

 

तू वफ़ा कर सकी न रिफ़अत से मगर

तुझकोे चाहा बहुत  टूट कर ज़िन्दगी

 

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