#Gazal by Rifat Shaheen

उसको मुहब्बतों की नज़ाक़त न आ सकी

हम उसको रस्मे इश्क़ सिखाते तो किस तरह

वो रूठने मनाने की लज़्ज़त ,वो लुत्फ़ ओ ज़न

वो रुख़ के मोड़ने की लताफ़त वो जुल्फे ख़म

वो तीरे नाज़ आबरू मगर दिल में गुदगुदी

वो कनखियों से देख के हँसना दबी हँसी

ये तो मेरे ख़्याल से नाज़ों अदा है बस

ये हुस्न की सिफ़ात है, हुस्ने अदा है बस

लेकिन वो एक शख़्स जो सबसे जुदा मिला

उसको अदाएं हुस्न से हर पल गिला रहा

वो लज़्ज़ते अदाएं मुहब्बत से दूर था

जाते ख़ुदी पे उसको निहायत गुरुर था

वो नाज़ जो के सिन्फए नाज़ुक का मेहर है

उसको समझ सका न मुहब्बत ही कर सका

इजाब ए वफ़ा का तकद्दुस तो छोड़िए

वो सजदा ए वफ़ा का सिला भी न दे सका

जिसको रफ़ाक़तों की इबादत न आ सकी

हम उसको रस्मे इश्क़ सिखाते तो किस तरह

 

रिफ़अत शाहीन

 

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