#Gazal by Rifat Shaheen

देख रहा था चुपके चुपके वो मेरी तस्वीर रिफ़अत

ढूंढ रहा था जाने कब से ख्वाबों की ताबीर रिफ़अत

मैं अनजानी कुछ न समझी उसके दिल की हलचल को

चौंकी जब पहनाई उसने बाहों की जंजीर रिफ़अत

क्या था ,क्यों था, कैसे था कुछ होश नही है आज तलक

एक तिलिस्मी आलम था और नज़रों का था तीर रिफ़अत

सोई मैं भी चैन से आखिर मदहोशी के बिस्तर पर

उसके लम्स की लज़्ज़त महकी बहकी कोई हीर रिफ़अत

गीत ग़ज़ल औ नज़्म भी मेरी फिर मनसूब हुई उससे

वो ग़ालिब इक़बाल था मेरा, था वो मेरा मीर रिफ़अत

ख्वाबों के फिर महलसरा में जाग उठीं कितनी चीखें

आन गिरी जब रुसवाई की भारी इक शहतीर रिफ़अत

आँखो की हद में भी रिफ़अत  हैरां हैरां मंज़र था

इश्क़ के सीने में उतरी जब मगरूरी शमशीर रिफ़अत

 

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