#Gazal by Rupesh Jain

जब ज़िन्दा था

जब ज़िन्दा था तो काश तुम सीख लेती जीने का क़ायदा

शम-ए-तुर्बत की रौशनी में ग़मज़दा होने का क्या फ़ायदा

इख़्लास-ओ-मोहब्बत जुरूरी है मुख़्तसर सी ज़िंदगी में

अपना बनाने को शर्त-ए-मुरव्वत रखने का क्या फ़ायदा

सर-ए-दीवार रोती रह ज़ालिम मैं लौट के नहीं आने वाला

क़ब्रनशीं के साथ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत सजाने का क्या फ़ायदा

तह-ए-क़ब्र तो सुकून-बख़्श मुझे तिरी मौजूदगी खलती है

मक़्तूल-ए-शौक़ हूँ अब मोहब्बत जताने का क्या फ़ायदा

पास-ओ-लिहाज़ में बिता दी सारी उम्र फ़ना होने से पहले

ज़मींदोज हूँ ‘राहत’ ब-सद-इनायत१० दिखाने का क्या फ़ायदा

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

शब्दार्थ:

१ शम-ए-तुर्बत -: क़ब्र पर दीपक

२ इख़्लास-ओ-मोहब्बत -: लगाव और प्रेम

३ मुख़्तसर -: थोड़ा, अल्प

४ शर्त-ए-मुरव्वत -: प्रेम की शर्त

५ सर-ए-दीवार -: दीवार के नीचे

६ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत – निकटता के सपने

७ तह-ए-क़ब्र -: समाधी के नीचे

८ मक़्तूल-ए-शौक़ -: प्रेम में मारा गया

९ पास-ओ-लिहाज़ -: सम्मान और ध्यान

१० ब-सद-इनायत -: सैकड़ों तरह की अच्छाई/दयालुता

Leave a Reply

Your email address will not be published.