#Gazal by S B S Yadvesh

मुझे अच्छा नही लगता !

गजल !

पुरानी राहों पर चलना , मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी चाल से चलना , मुझे अच्छा नहीं लगता

निरंतर चाल से चलना हमें धरती सिखाती है
बिलाऊ भय से रुक जाना मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी राहों पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

पुजारी हूं कठिन श्रम से , कमाई करने वालों का
भिखारी को खुदा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी रांहों पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

लकीरी राँह पर चलकर फकीरी सीख लूं लेकिन
भेंड़ की चाल कटमरना , मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी रांहों पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

हुनर के बल निकल जाऊं , चीर कर आग अंगारे
दिये की लौ पतंगे का मिलन ,अच्छा नहीं लगता
पुरानी रॉहों पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

समय के दौर छू लेना मैं चाहूँ , अपनी मंजिल को
चल कछुआ चाल पछताना मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी रांहो पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

पुरानी पटरियों पर मिल नहीं सकती नयी मंजिल
नया कुछ कर गुजरने बिन मुझे अच्छा नहीं लगता
पुरानी रॉहों पर चलना मुझे अच्छा नही लगता

पा लेना चाहता सब कुछ , इसी ही शेष जीवन में
वर्तमानों से जन्नत की सुला अच्छा नहीं लगता
पुरानी रांहों पर चलना , मुझे अच्छा नही लगता

यादवेश

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