# Gazal by S B S Yadvesh

गजल

आज ही की रात मेरे द्वारा सपनों में गाई गई ग़ज़ल है

 

साँच कह दूँ , तो अभी , हमसे  विदग जाओगे

झूठ की आँच से   ,  आगोश में आ जाओगे

 

जैसे निपट रही है , वैसे  निपटने दो

कुछ साँच रहने दो  , कुछ झूठ रहने दो

तकरार बढ़ाने से ,  बढ़ जायेगी मुश्किल

मुझे मोम रहने दो ,  न शीशा दरकने दो

जैसे निपट रही है  , वैसे निपटने दो

कुछ साँच रहने दो  , कुछ झूठ रहने दो

 

परिछायीं  सिमट गुम हुई , जेठों की दुपहरी

छातों के ही शायों में , मुझको मटकने दो

जैसे निपट रही है ,  वैसे निपटने  दो

कुछ साँच रहने दो , कुछ झूठ रहने दो

 

भँवरों से बचाया है इसे , काँटो में छुप कर

मकरंद छलकता है , मकरंद घुटकने दो

जैसे निपट रही है  , वैसे निपटने  दो

कुछ साँच रहने दो ,  कुछ झूठ रहने दो

 

कल्पनाओं की मंजिल को , छू लेने दो मुझको

न मुझे अन्त जनाओ , मुझे यूं ही फुदकने दो

जैसे निपट रही है  , वैसे निपटने दो

कुछ साँच रहने दो , कुछ झूठ रहने दो

यादवेश

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