#Gazal by S K Gupta

यारियां निभाने का  वक़्त न मिला

दूरियां घटाने  का वक़्त  न  मिला।

 

भाग दौड़ में  ही गुज़र गई  ज़िंदगी

ज़रा भी सुस्ताने का वक़्त न मिला।

 

सफर जो भी कटना था कट ही गया

सिलसिले बनाने का वक़्त न मिला।

 

ज़रा सी बात पर  ही जो रूठ गए थे

फ़िर उन्हें मनाने को वक़्त न मिला।

 

जिससे जीते हार भी उसी से मान ली

हाले दिल सुनाने का वक़्त  न मिला।

 

दिल की दीवार पर सीलन है ग़म की

कभी धूप दिखाने का वक़्त न मिला।

 

घुट कर रह जाएंगी ये तन्हाइयां मेरी

ख़ुद को ही रिझाने का वक़्त न मिला।

 

कुछ तो ऐसा हो कि मैं ज़िंदा रह सकूं

मुक़द्दर आज़माने का वक़्त न मिला।

 

—   सतेन्द्र गुप्ता

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