#Gazal by S K Gupta

सच ढूंढने निकला था

झूठ ने मुझे घेर लिया

सच ने मुंह फेर लिया

 

पांव डूबाए बैठे थे पानी में झील के

चाँद  ने  देखा तो  हद से  गुजर गया

आसमां से उतरा पांव में गिर गया

 

परदेस चले गए थे कमाने के वास्ते

लौट आए शक़्ल किसको दिखाते

दास्ताने दर्द किस किसको सुनाते

 

इस कदर तराशा है हुस्न तेरा  उसने

जैसे तूझे अपने लिए ही बनाया है

गुरूर तुझ में नहीं उसमें भी समाया है

 

उसकी शान में कुछ तो अता कर

हर चीज़ मिल जाती है दुआ से

मांग कर तो देख ले तू खुदा से

 

सत्येन्द्र गुप्ता

 

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