#Gazal By Sagar Yadav Jakhmi

ग़ज़लें

1
खुद को जो बदले नहीं बस रास्ते बदला किये
वे हमेशा अपने भावी लक्ष्य से भटका किये

पत्थरों के सामने हम सिर झुकाते रोज़ हैं
हो गई मुद्दत हमें मां – बाप को सजदा किये

भ्रष्ट नेता और चोरों में कोई अंतर नहीं
दोनों बारी – बारी अपने मुल्क को लूटा किये

एक औरत न्याय के खातिर गई थाने में क्या
सब सिपाही मिलके उसके साथ मुंह काला किये

यू्ं तो मिलने को हज़ारों बार हैं उनसे मिले
ग़म है बस इतना कि उनके प्यार को तरसा किये

जिंदगी तो मौत की है दी अमानत दोस्तों
लोग लेकिन इस हकीक़त से सदा पर्दा किए

वक्त ने दामन मेरा खुशियों से ‘ सागर ‘ भर दिया
वरना पहले हम भी हैं यूं फूटकर रोया किये

2
गमों का चीरकर सीना कभी कोई खुशी निकले
गुनाहों के समन्दर से तो बाहर आदमी निकले

हमारे मुल्क में चारों तरफ छाया अँधेरा है
दिये सब बुझ गए हैं अब कहाँ से रोशनी निकले

वतन के नौजवानों ये तिरंगा झुकने ना पाए
भले इसकी हिफाजत मेंं तुम्हारी जान ही निकले

अगर पैसे नहीं दूंँ तो वे बातें तक नहीं करते
मेरे अपने सगे भाई भी कितने स्वार्थी निकले

मैं समझा था तुम्हारे दिल मेंं केवल मैं ही रहता हूँ
मगर मेरे सिवा दिल मेंं तुम्हारे और भी निकले

3
झुका हो देश का परचम मुझे अच्छा नहीं लगता

उदासी का कोई मौसम मुझे अच्छा नहीं लगता

फरिश्ते रूठ जाएँ तो उन्हें मै फिर मना लूँगा

मगर हो माँ की आँखें नम मुझे अच्छा नहीं लगता

हमेशा दीन दुखियों को मधुर मुस्कान है बाँटी

किसी के चेहरे पर गम मुझे अच्छा नहीं लगता

मै अपने दिल के जख्मों को हमेशा ताजा रखता हूँ

कोई इन पर रखे मरहम मुझे अच्छा नहीं लगता

मेरे ही घर में हो या फिर मेरे दुश्मन के घर में हो

किसी के घर भी हो मातम मुझे अच्छा नहीं लगता
4
भुखमरी की आग में जलकर जो बच्चे मर रहे हैं

पढ़ने-लिखने की उमर में बूट पालिश कर रहे हैं

क्या पता कुछ लोग हँसकर झूठ कैसे बोलते हैं

एक हम हैं जो सही कहते हुए भी डर रहे हैं

हिन्दू-मुस्लिम भाईयों को एक दूजे से लड़ाकर

ये सियासी लोग अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं

हम बहुत ही श्रम किए तब जाके ये फसलें उगी हैं

कुछ समय तक तो हमारे खेत भी बंजर रहे हैं

इश्क करने वालों का अंजाम होता है भयानक

खून से लथपथ सदा ही आशिकों के सर रहे हैं
5
वक्त की आँखों से तुम काजल चुराना सीख लो
अपने सोए भाग्य को खुद ही जगाना सीख लो

जिस तरह गम आया है उस तरह ही जाएगा
मुश्किलों के दौर में भी मुस्कुराना सीख लो

दूसरों के टुकड़ों पर पलना नहीं अच्छा मियाँ
मेहनत-मजदूरी से पैसे कमाना सीख लो

चंद सिक्कों के लिए जो बेच दे ईमान को
ऐसे बेईमान को जिंदा जलाना सीख लो

लहरों से यदि डर गए तो पार जा सकते नहीं
दोस्तों ,तूफान में कश्ती चलाना सीख लो

अपने हो या गैर हो सबसे मुहब्बत कीजिए
दुश्मनों के दिल में अपना घर बनाना सीख लो

6

भले ही पाँव को जलते हुए अंगार पर रक्खा
मगर सच्चाई को मैंने सदा मेयार पर रक्खा

उसे मंजिल सफलता की यकीनन मिलती है यारों
नजर जिस शख्स ने भी वक्त की रफ्तार पर रक्खा

किसी दिन मिट्टी में मिल जाएगी मालूम था फिर भी
भरोसा हर किसी ने मिट्टी की दीवार पर रक्खा

किसी से इश्क फरमाना नहीं है खेल बच्चों का
जमाना हर घड़ी पहरे पे पहरा प्यार पर रक्खा

मुझे रब से शिकायत है तो बस इतनी शिकायत है
नहीं उसने कभी करुणा मेरे परिवार पर रक्खा

7

दीये को बुझने से बचाता हूँ
हाँथ यूँ ही नहीं जलाता हूँ

आपकी आँखों के समन्दर में
जब उतरता हूँ डूब जाता हूँ

अपने माँ-बाप की तरह मै भी
चोट खाकर भी मुस्कुराता हूँ

सारा मयखाना झूम उठता है
हाँथ में जाम जब उठाता हूँ

लोग आँसू बहाने लगते हैं
मै अगर शायरी सुनाता हूँ

जिंदगी एक दिन दगा देगी
सोचता हूँ तो सूख जाता हूँ

लड़कियाँ बेवफा नहीं होती
अपना अनुभव तुम्हें बताता हूँ

-सागर यादव’जख्मी’

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