#Gazal by Salil Saroj

ज़ख्मों से गिला बाक़ायदा बेमानी ही था

आखिर मैं काबिल-ए-मरहम ही कब था ।।1।।

 

मेरे जलने में सिर्फ मेरा ही कुसूर न था

शान्त उसका हुश्न-ए-बरहम ही कब था ।।2।।

 

मेरे नाम लेने से वो बदनाम कभी न था

बाज़ारों से उठा दागो-दिरहम ही कब था ।।3।।

 

वो चाँद बनके निकल तो भी दाग ही था

मुरुब्बत का चेहरा नूर-ए-पैहम ही कब था ।।4।।

 

इस सफर को होना बस तमाम ही सा था

उसके दिल में रोज़ा-ए-रहम ही कब था ।।5।।

 

सलिल सरोज

 

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