#Gazal by Salil Saroj

अब मेरी ज़ुबाँ की धार बहुत तेज़ है

क्यों न हवा के पंखों को उतार दूँ मैं ।।1।।

 

निगाहों में पानी की जगह तेज़ाब है

क्यों न फिर फ़िज़ाओं को औजार दूँ मैं ।।2।।

 

हाथों में ख़ज़र घूमते हैं चूड़ियों की जगह

क्यों न ज़मीन के सीने में उतार दूँ मैं ।।3।।

 

हरकतें मेरी चिंगारी से भी असरदार हैं

क्यों न दरिया का बसर उजाड़ दूँ मैं ।।4।।

 

बिन कुछ कहे ही सब कुछ कर सकता हूँ

क्यों न रात की माँग में सन्नाटा पसार दूँ मैं ।।5।।

 

मुझे यकीन है मेरी  ही हैवानियत पर

कोई गर माँगे तो मौत तो हज़ार बार दूँ मैं ।।6।।

 

सलिल सरोज

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