#Gazal by Salil Saroj

तुम्हारे खत जो  छिपाए थे किताबों में

उन खतों में आज भी महक़ बहुत है ।।1।।

 

उसके घर में ज़रूर कोई बेटी होगी

उसके घर में बाकायदा चहक बहुत है ।।2।।

 

तुम जो चाहो तो क़मायत अब भी आ जाए

यक़ीनन तुम्हारे हुश्न में आज भी दहक बहुत है ।।3।।

 

जरूर किसी मुफ़लिस पे ज़ुल्म ढाते हो

तुम्हारी हर बात में ही ठसक बहुत है ।।4।।

 

किसी नाज़नीं ने सितमसाई की होगी

उसकी नज़्मों में बारहाँ कसक बहुत है ।।5।।

 

सलिल सरोज

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