#Gazal by Salil Saroj

ये तन्हाइयों का गूँजता शोर है कैसा

हर ओर छाया कुहासा घनघोर है कैसा ।।1।।

 

मस्जिद से अजान तो आती ही रही

फिर इंसानों में छिपा हुआ चोर है कैसा ।।2।।

 

हुकूमत तो सब्ज़बाग ही दिखाती रही

कौम के सीने पे चलता जोर है कैसा ।।3।।

 

रोशनी की तानाशाही ही जब हो रही

फिर निगाहों में अँधेरा हर ओर है कैसा ।।4।।

 

भाषणों में दिन रात गठजोड़ हो रही

फिर साबूत रिश्तों का टूटा डोर है कैसा ।।5।।

 

रात भर चाँदनी शीतलता उड़ेलती रही

फिर पसीने से तर-बतर ये भोर है कैसा ।।6।।

 

सलिल सरोज

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