#Gazal by Salil Saroj

मुझको मुझसे ही मिले इक ज़माना हो गया
अपनी पहचान भी अब तो फसाना हो गया

जो वक़्त पसंद थे मेरी तबियत और मिज़ाज़ को
वो हर लम्हा,बीते लम्हों के साथ पुराना हो गया

कमाता कम था फिर भी कितना शुकून था मुझे
बेशरम ख्वाहिशों का ख्वामखाह निशाना हो गया

नींद कम आती है और वो भी किश्तों में ही
ख़्वाबों का भी बन्द मुझमें आना-जाना हो गया

क्यों और कैसे करूँ किसी और से मैं शिकायत
शौक मेरी ज़ुबाँ को जब दर्द का तराना हो गया

सलिल सरोज

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