#Gazal by Salil Saroj

राहों पे बाट जोहती जवानी रही

मेरे गाँव की यही निशानी रही

 

जो कदम गए , कभी लौटे नहीं

सदियों तलक यही परेशानी रही

 

पनघट, खेत, नदी-नाले रोते रहे

दिन-रात हर जगह वीरानी रही

 

माँ को सोए हुए एक अरसा हुआ

हर घर कहती यही कहानी रही

 

सब दोस्त तड़प उठे विदाई पर

सीने की उफ़क बेज़ुबानी रही

 

खत में नाम-पता सब दिखता है

बेचैन होती हुई रूह सयानी रही

 

सलिल सरोज

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