#Gazal by Salil Saroj

जब दीप जलाई है तो रोशनी बिखरेगी कहीं न कहीं
ये फ़िज़ा दुल्हन सी जरूर निखरेगी कहीं न कहीं
बेटियाँ नेमतें है जो सबको खुदा अता नहीं करता
बेटियों की हँसी से खुशियाँ दिखेंगी कहीं न कहीं
बस एक मौके की दरकिनार है इनके जज़्बों को
ये आज की नारी हैं,ये इतिहास लिखेंगी कहीं न कहीं
इस बेजान जम्हूरियत में बदलाव बहुत जरूरी है
आवाम की ज़बानें हैं ये ,सच कहेंगी कहीं न कहीं
कब तक ज़ुल्म दबा सकता है शराफत की तदबीरें
आग की जद में बेजान लाशें भी चींखेंगी कहीं न कहीं
सलिल सरोज

Leave a Reply

Your email address will not be published.