#Gazal By Salil Saroj

आज फिर मेरा टेलीविजन बीमार हो गया
हिन्दू-मुस्लिम दंगों का शिकार हो गया

वही पुरानी घिसी-पिटी बेमतलबी बातें
किसी रद्दी वाले की कबाड़ हो गया

प्रवक्ता एक दूजे की जान के प्यासे
सबकी शिखाओं में खून सवार हो गया

सही क्या है,गलत क्या है,कुछ पता नहीं
यह खुद अपनी शख्सियत से बेजार ही गया

भ्रम,मिथ्या,अंधविश्वास,छलावा से भरा पूरा
चीख-चिल्लाहट,शोर-गुल का बाज़ार हो गया

अशांति,अराजकता,लोभ,द्वेष और दंभ का
फलता-फूलता नया कारोबार हो गया

न कोई हथियार, न कोई वैचारिक द्वन्द्व
घर-घर में बैठा यह जानलेवा हथियार हो गया

सलिल सरोज

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