#Gazal by Salil Saroj

वो  जितना  सुना ज़माने की सुना

दफ़अतन मेरा ही सुनाना रह गया

 

वो दास्ताने-इश्क़ सबको बताता रहा

पर जिसको था उसी को बताना रह गया

 

सारी महफ़िल न जाने क्या कहता रहा

जो अफसाना था वही कहना रह गया

 

खुद को तो जला ही चुके हो बेख़ुदी में

इस बेदिली में मुझे  ही जलाना रह गया

 

ये तेरी संगदिली की इन्तहां ही है

क्या मुझे भुलाने का कोई और बहाना रह गया

 

सलिल सरोज

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