# Gazal by Salil Saroj

तमाशा भी हम हैं और तमाशाई भी हम ही हैं

शराफत की बोटियाँ काटते कसाई भी हम ही हैं।।

 

ज़ख्म भी हम हैं और ज़ख्मी भी हम ही हैं

ज़हर बनाकर फिर बाँटते दवाई भी हम ही हैं।।

 

दंगा भी हम हैं और दंगाई भी हम ही हैं

लाशों के ढ़ेर पर बाँचते रुबाई भी हम ही हैं।।

 

दरिंदा  भी हम हैं और दरिंदगी भी हम ही हैं

ज़ुबान की चाशनी से शनासाई भी हम ही हैं।।

 

शैतान हम हैं और शैतानी भी हम ही हैं

भेष बदल कर छलते हुए फिर मसीहाई भी हम ही हैं।।

 

सलिल

 

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