#Gazal by Sandeep Badwaik

!!  ग़ज़ल  !!

 

मुझसे टकराके गुलामी अक़्सर शर्मिंदा होती है…

महंगी बेड़ियोमें कौन आज़ादी जिंदा होती हैं..।

 

रिश्ते बनाओ शौक़ से मग़र इतनी बात याद रक्खो…

जहाँ आसरा ढूँढ़ते हो, वो बाँहे फंदा होती है ..।

 

उसूलोको घर बनाया है और एक मुद्दत से उसने …

फ़िज़ा के गुलशन में भी यारो मौज़ चुनिंदा होती हैं..।

 

मेरी ख़ामोशी ने फिरसे दुशमन बनाया है मुझको…

सब कुछ कह दूँगा अग़र मुलाक़ात आईंदा होती है..।

 

तेरी आग़ोश में आसमान समेट लेना मेरी माँ…

ना जाने क्यूं ‘ ख़ब्तुल ’ तेरी उड़ान परिंदा होती है..।

 

‘ ख़ब्तुल ’

संदीप बडवाईक

 

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