#Gazal by Sandeep Badwaik

आओ गुनहगारो आपकी ख़ंजर बदल दू…

क़त्ल के तरीक़े कि, लहू के मंज़र बदल दू..।

 

नये-नये लिबास ये भी कोई बदलाव है…

क़रीब बैठ तुझे अंदर ही अंदर बदल दू..।

 

कुछ लोग है जिनके कारण जहाँ में नमक है…

इनके सहारे ये तमाम समंदर बदल दू..।

 

दुनियाँ जीत के और हाथ फैलाने वाले…

अपाहिज सोच के भिखारी सिकंदर बदल दू..।

 

हड्डियां गल गयी,अक्ल भी सड़ गयी हिजड़ो…

क्यों न फिर मैं खुर्चीसे लिपटॆ बंदर बदल दू..।

 

हर नज़र बताये यहाँ इ्श्क़ की कमी ‘ ख़ब्तुल ’…

सिनेमें पड़ी दिल की ज़मीन बंजर बदल दू..।

‘ ख़ब्तुल ’संदीप बडवाईक  – 9764984139

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