#Gazal by Saurabh Dubey Sahil

~ कहीं ये मेरा शहर तो नही हैं ~

 

इस धुंध में दिन तो समझ आता नहीं है,

कहीं ये रात का कोई पहर तो नही हैं ।

 

इस सर्द मौसम में भी दम घुट रहा हैं ,

कहीं ये फिजाओं में घुला जहर तो नही हैं ।

 

हर कोई आधुनिक सुविधाओं मे व्यस्त ,

कहीं ये प्रकृति का कोई कहर तो नहीं हैं ।

 

रोज साँसों में समाती धूल भरी आँधियाँ ,

कहीं ये रेत की कोई लहर तो नहीं है ।

 

अस्पतालों में बढती हुई  भीड़ घटती साँसे ,

सहमा सहमा कहीं ये मेरा शहर तो नही है ।

 

~  सौरभ दुबे ” साहिल ”

किशनी मैनपुरी ( यूपी )

 

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