#Gazal by Shailendra Khare Som

बहर-2×15

काफ़िया- आ स्वर

रदीफ़-करता हूँ

 

मैं  पागल  सायों   के  पीछे-पीछे   भागा  करता हूँ

वीरानों  में  गीत  मिलन  के अक्सर गाया करता हूँ

 

अब केवल मयखाने में  ही  चैन  मे’रा दिल पाता है

मन्दिर मस्जिद की राहों  पर मैं तो बहका करता हूँ

 

क्या जानूँ नयनों की भाषा खुद को जैसे भूल गया

गैरों से  आंसू  लेकर  मैं भी    तो   रोया  करता हूँ

 

कलकी भोर नही देखूँ मैं ऐ मालिक दिल ऊब गया

लिख देता हूँ रोज  वसीयत जब मैं सोया करता हूँ

 

मैं अज्ञान कला क्या जानूँ कुछभी सीख नहीं पाया

पर इतना संज्ञान है’मुझको कागज काला करता हूँ

 

लगते  हैं  अपने   बेगाने  भूला  बस्ती  हस्ती  सब

अपने घर की  राह सभी  से मैं खुद पूछा करता हूँ

 

कोई बात  हुई  ऐसी  जो  मुझको  भी मालूम नहीं

क्यूँ  तेरे  बारे   में  खुद  से ज्यादा सोचा करता हूँ

 

सोम भला कैसाशिक़वा जो कोई अपना खास नहीं

अपनों  के  कारण  अपनों  को रोते देखा करता हूँ

 

~शैलेन्द्र खरे”सोम”

 

 

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