#Gazal by Shailendra Khare Som

बह्र-212 212 212 212

काफ़िया- अर

रदीफ़- जाएगा

 

जान भी  जायेगी  ये   जिगर  जाएगा

ऐसे देखो न  आशिक तो  मर जाएगा

 

फूल  नाज़ुक  है ये  इसको  छूना नहीं

टूटकर बस जमीं पर   बिखर  जाएगा

 

है   नशा   तो   अभी   मैं    शहंशाह हूँ

ये  नशा  रात   भर   में  उतर  जाएगा

 

चैन  पाता  नहीं  अपने   घर  में अगर

जा  रहा है तो  जा  तू  किधर जाएगा

 

कुछ निकल जायेगी आँसुओं में तपन

वक्त के  साथ  हर  जख़्म भर जाएगा

 

खुद   तमाशा   बनेगा   वो   संसार में

जो  मेरे  दिल  से  यूं  खेलकर जाएगा

 

मत पढ़ो  जोर  से सुर्खियां आजकल

पेट  में  भी  जो  बच्चा है डर जाएगा

 

रंगतों   के    लिए   भागना    छोड़ दे

तितलियाँ  तो मिलेंगीं  जिधर जाएगा

 

“सोम”रुख से अगर वो हटा दें नकाब

वक्त  भी  एक  पल को  ठहर जाएगा

 

~शैलेन्द्र खरे”सोम”

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