#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

हर ग़म से गुज़रा हूँ, अब खुशियों का इंतज़ार नहीं !

अब तक ज़िंदा हूँ मगर, अब जीने की दरकार नहीं !

मैं तो मुरझाया फूल हूँ उजड़े हुए चमन का, मगर

चुभन से भर दूँ मैं किसी का दामन, मैं वो खार नहीं !

दुनिया के बाजार में तो बिकता है सब कुछ मगर

मैं तो नाकाम चीज़ हूँ ऐसी, कि जिसका खरीदार नहीं !

ये मतलब के नाते रिश्ते बड़े क़रीब से देखे हैं मगर

यहां पै किसी के दर्दो ग़म से, किसी को सरोकार नहीं !

जानता हूँ कि अतीत के लिए रोना बेमानी है मगर,

क्या करूँ “मिश्र” इस दिल पै, मेरा कोई इख़्तियार नहीं !

शांती स्वरूप मिश्र

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