# Gazal by Shanti Swaroop Mishra

कैसी सजा है ये ज़िन्दगी, ये हमसे न पूँछिये !

कैसे गुज़रते हैं ये रात दिन, हमसे न पूँछिये !

बामुश्किल भूल पाए हैं गुज़रे जमाने को हम,

कैसे बिखरती है ख्वाहिशें, ये हमसे न पूँछिये !

जिन्हें रास आया हे जीना उन्हें दुआ है हमारी,

मगर मरते हैं कैसे घुट घुट के, हमसे न पूँछिये !

रोशन हैं घर जिनके मुबारक हो रौशनी उन्हें,

मगर कैसे पसरते हैं सन्नाटे, ये हमसे न पूँछिये !

खुश रहें इस दुनिया के लोग तमन्ना है हमारी,

पर आंसुओं की कीमत है क्या, हमसे न पूँछिये !

ज़िन्दगी उलझन के सिवा कुछ भी नहीं “मिश्र”,

लोग कैसे कुचलते हैं अरमां, ये हमसे न पूँछिये !

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