#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

यारो गुज़रे हुए उन लन्हों कोहम कैसे भुला दें  

आखिर अपनों के करतबों कोहम कैसे भुला दें

हम चले थे साथ मिल कर एक कारवां बना कर,  

पर उन कंकड़ से भरे रस्तों कोहम कैसे भुला दें 

वक़्त आता है चला जाता है छोड़ कर निशाँ अपने,

भला सर पड़ी उन आफतों कोहम कैसे भुला दें

वक़्त के हर दौर मैं जो शामिल थे मेरी इमदाद में

आखिर मेहरवां जिन्दा दिलों कोहम कैसे भुला दें 

ज़िन्दगी के सफर में साथ छोड़ा  जाने कितनों ने,

भला उनके सुझाये मशविरों कोहम कैसे भुला दें 

मिश्र” आये थे हम दुनिया में कुछ करने के वास्ते,

फिर उसके दिए उन मक़सदों कोहम कैसे भुला दें  

शांती स्वरूप मिश्र

 

 

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