#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

ज़िद नहीं कि किसी को, मैं लाचार कर दूँ 

किसी के दिल को यूं ही, मैं बेज़ार कर दूँ

 

ख़ुदा ने बख्सी है ये फूलों सी ज़िंदगी यारो,

हक़ नहीं है मुझको, कि उसमें खार भर दूँ

 

मोहब्बत की राहें तो होती हैं बड़ी खामोश,

फिर मैं भी भला कैसे, खुला इज़हार कर दूँ

 

तोड़ कर चाँद सितारे तो ला नहीं सकता मैं,

भला कैसे मैं उनकी शर्त पे, इक़रार कर दूँ  

 

तन्हाइयों में रहना बड़ा ही मुश्किल है “मिश्र“,

तो फिर अपनों से भला कैसे, मैं रार कर दूँ

 

शांती स्वरूप मिश्र

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