#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

आज तो दिल में, यादों का चमन सजा बैठा है !
अतीत का हर लम्हा, काबिले याद बना बैठा है !

वक़्त था कि रोज़ मिलते थे अपने यारों से हम,
अब तो कोई कहीं, तो कोई कहीं जमा बैठा है !

आये थे इस शहर में जोशो जवानी लेकर हम,
मगर अब कोई नाना, तो कोई दादा बना बैठा है !

आये थे आशाओं से भरा निश्छल दिल लेकर,
अब कोई अहम्, तो कोई वहम का मारा बैठा है !

हमने भी देखे थे कभी नज़ारे खुली आँखों से,
अब तो उन पर, ये बुढापे का चश्मा चढ़ा बैठा है !

क्या इसी को कहते हैं ज़िंदगी जीना दोस्त कि,
जो था सहारा औरों का, अब लाचार बना बैठा है !

न पहिचान पाओगे “मिश्र” अपनों को भी अब,
अब हर कोई, अपने चेहरे पर मुखौटा लगा बैठा है !

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