#Gazal by Subhash Pathak, Jiya

क़त्ल करता है मुस्कुराहट का,
उफ़्फ़ क़यामत है दर्द का झटका,

सब गुज़रते हैं मेरे  सीने   से,
मैं हूँ इक पायदान चौखट का,

बादलों से बचा लिया मैंने,
चाँद लेकिन शजर में जा अटका,

एक मुद्दत हुई  ये  दरवाज़ा,
मुन्तिज़र है तुम्हारी  आहट का

मैं जो दीदार को तड़पता हूँ
ये करिश्मा है तुम्हारे घूँघट का,

पास हैं हम कि दूर क्या  समझें,
फ़ासिला है  तो  एक करवट का,

जिस्म बिस्तर पे ही रहा शब् भर,
दिल न जाने कहाँ कहाँ भटका,

                         सुभाष पाठक’ज़िया’

153 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.