#Gazal By Subhash Pathak

वक़्त के साथ मैं चलूँ कि नहीं,
सोचता हूँ  वफ़ा करूँ कि नहीं,

तुझसे मिलकर तेरा न हो जाऊँ,
सो  बता तुझसे मै मिलूँ कि नहीं,

वो मुसल्सल सवाल करता है,
उसको कोई जवाब दूँ कि नहीं,

उसने मुड़ मुड़के  बारहा देखा,
मैं उसे देखता भी हूँ कि नहीं,

मेरे ही जिस्म तक न पहुँचा नूर,
सोच में है दिया जलूँ कि नहीं,

ये  ख़ुशी है छुई मुई जैसी ,
मशवरा दो इसे छुऊँ कि नहीं,

ऐ ‘ज़िया’ तू है जुस्तजू मेरी,
मैं तेरा इन्तिज़ार हूँ कि नहीं,

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