#Gazal by Sudesh Dixit

ग़ज़ल

——‘-”””–‘

पहले बहलाया ,फुसलाया गया मैं ।

बकरा बना कर बलि चढाया गया मैं ।।

सबूत मुलज़मों के इकट्ठे करके जो दिये ।

इसी गुनाह में मुलज़म वनाया गया मैं ।।

 

मेरी आबाज बन जो लडे नफरत से ।

आबाज ऊंची न करूं  तभी तो दवाया गया मैं ।।

 

दम भरते थे  मेरी दोस्ती का जो हरपल ।

उन्ही के द्धारा हरबार ठुकराया गया मैं ।।

 

अब नही रही  पूछ घर मे कोई मेरी ।

इक रिस्ते की तरह निभाया गया मैं ।।

 

सयासत खूब हुई मेरी लाश पर देखो ।

न जलाया न दफ़नाया गया मै ।।

 

आग जनी का अंदेशा था जलाने,दफ़नाने में ।

इस लिये पानी मे बहाया गया मैं ।।

 

न हिँदू ,न मुसलमां, नसिख,न ईसाई ।

फिर फसाद की जड क्यों वनाया गया मैं ।।

 

नहीँ लिया फैसला “दीक्षित”को पूछ कर कोई ।

बताओ फिर क्यों कर सूली चढाया गया मैं ।।

 

सुदेश दीक्षित

 

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