#Gazal By Sufi Jakir Nawazy

गज़ल

बहुत हो गई तेरी शौला बयानियां
आ बैठ मेरी खामोशियों को पढ जरा ।

हर बात जुबा से कही नहीं जाती,
इशारे नजरों के भी समझ जरा ।

ये हुस्नो शोहरत का उरूज मुबारक,
मुहब्बत की खातिर जमीं पे उतर जरा।

ये कसमे , ये वादे , ये जुमले बाजियां
बहुत हुआ, कुछ हकीकत भी कह जरा ।

बहुत सजाई तन्हाईयों में महफिलें ‘नवाजी ‘
अब महफिलों में तन्हा भी रह जरा ।

सूफी जाकिर ” नवाजी “

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