#Gazal by Tej Vir Singh Tej

कितनी बेशर्मियाँ आज़माने लगे

इश्क़ में लोग क्या गुल खिलाने लगे।

 

डर कि मेरी जुबां खुल न जाये कहीं।

वो सितम दिन -ब दिन ही बढ़ाने लगे

 

हम बग़ावत को  शायद निकल ही पड़ें

ज़ख़्म दिल के बहुत अब  सताने लगे।

 

उनको पाने की दीवानगी देखिये

हम किताबों से भी दिल चुराने लगे।

 

रूठने का फकत हमने नाटक किया

हमको हँस हँस के वो भी मनाने लगे।

 

लोग कहते हैं सब लुट गया इश्क़ में।

मेरे हाथों गजब के ख़ज़ाने लगे।

 

अब किसे चैन रातों को दिन को सुकूँ।

बन के आंसू वो पलकों पे छाने लगे।

 

क़त्ल करने में माहिर अजब “तेज “हैं

बातो बातोँ में छुरियाँ चलाने लगे

 

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