#Gazal by Uday Shankar Chaudhari

दिवाना है नही मुझसा कोई भी जमाने में

मेरे महबुब के जैसा कहां कोई जमाने में

आशिक हूं वतन का प्यार मुझको जमीं से है

मुहब्बत है तिरंगे से ना दुजा है जमाने में

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पकड़ता हूं कलम जब भी कोई श्रृंगार लिखने को

कलम चलती नहीं कहती जमीं का दर्द लिखने को

नजर जाती किसानों पर उनके आशियानो पर

सजल मन से कलम बढती दबे अरमान लिखने को

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जमीं को सींचते हैं जो जिगर के खुन पानी से

उन्हीं के हैं भींगे दामन आंखो के पानी से

मेहनत का नहीं फल मिल रहा हालात है कैसी

समर्पन प्राण है जिनका दुखी हैं जिन्दगानी से

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नहीं अबतक नजर डाला हमारे हुक्मरानों ने

भुखे सो रहे मजबुर बेबस हो मकानो में

“बिहारी” हूं वहां का हाल क्या कैसे बताऊं मैं

उचित श्रम भी नहीं मिलता किसी कारखाने में

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गांवो की व्यथा को देख कर मन डुब जाती है

लिखे श्रृंगार हम कैसे कलम खूद उब जाती है

जमीं से प्यार है हमको जमीं की बात करता हूं

मुहब्बत मुल्क से की है वतन पे प्यार आती है

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शिक्षा हो या फिर साधन या लेनी दवाई हो

जरुरत की हो चीजें या बच्चों की पढाई हो

नजर से देखता हूं वो भला कुछ कर नहीं पाते

बड़े हीं तंग हैं वो भी गरीबी की गहराई से

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One thought on “#Gazal by Uday Shankar Chaudhari

  • April 4, 2017 at 1:34 am
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    Nice , beautyfull ,✍✍✍✍

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