#Gazal by Vijay Narayan Agrwal

गज़ल रूप मे मन के भाव

 

कैसे  कहूँ  मैं  दिल  के  जज्बात एै सिपाही।

करता हूँ नमन वंदन बिन ज्ञान औ सियाही।।

 

इन्सानियत पे जब भी गुरुबत का वार होता,

संजीदगी    सुहाती   ऐलान   के   बिना   ही।

 

सजदे में जाके देखा मंजर जो उस अलम का,

खा़मोश  थी  इबादत, व्यवधान   की  मनाही।

 

हुक्मे   सवाल   कोई  करता  नही  जेहन  से,

दिलसाद  का  वजीफा  काटे  सदा  बला  ही।

 

दरबार   हमने  देखा, दामन  फैला के  उसके,

गुलजार   थी   महब्बत  गुमनाम  था  इलाही।

 

नफ़रत के बीज बो कर  खुश होता है जमाना,

कहते  हैं लोग  मद से,ज़िल्लत  है खै़रख्वाही।

 

वाहिद  बना   गुरू   तो  रिस्ते को  कौन  तोड़े,

एहसास  के   बिना  ही   दे  देता  वो   गवाही।

 

उर्दू  न  मात्र   भाषा  न  ही  ‘भ्रमर’ जे़हनियत,

कुदरत का प्यार देखो उन् वान  की  उगाही।।

 

‘भ्रमर’. रायबरेलवी

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