# Gazal By Vijay Narayan Agrwal

चूडियॉं   –  गजल

दिख रही है खा़स मंजिल,
पर न देखा आसियॉं।
कह रही है आज मुझसे,
खन खनाती चूड़ियॉं।।

आरजू लेकर चली वे,
गुफ्तगुँ के साथ में,
फिर नही क्यूँ डर रही,
अहले वतन की नीतियॉं,

जिन्दगी गुस्ताखियॉं के,
बीच में ही खेलती,
फिर यहॉ क्यूँ खास नजरें,
रख रही हैं बेटियॉ,

शर्म का परदा हटा वे,
घूमती बाजार में,
कैसे कह दूँ कातिले,
शमशीर की हैं चोटियॉ।

क्या इस तरह बारिस हुयी है,
दौलते इरफान की,
जो बता पाना है मुश्किल,
हम्द की बारीकियॉं।

सम्त कोई मिल न पाया,
दर – बदर ढूँढा उसे,
फिर भी उनका हौसला है,
नोंच लेंगे बोटियॉं।

हुश्न लैला जाम पर बस,
जाम ही पीती रही,
जब सुख़न एहसास जागा,
लुट चुकी थीं शोखियॉं।

बेपर्दगी से क्या ‘भ्रमर’
उनको नहीं एतराज है,
जो बहारे शम्स का खूँ ,
पी रही है तितलियॉं।।

‘भ्रमर’ रायबरेली

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