#Gazal by Vinay Akshat

 ग़ज़ल
झूठों की झूठी गवाही से हारा
मैं जीतने की मनाही से हारा।
करी जीत हांसिल गुनाहों से मैंने
हुआ यूं कि फिर बेगुनाही से हारा।
पहुंचा भले चांद तक आज इंसाँ
मगर वो कुदरती तबाही से हारा।
उसे इस कदर आत्मश्लाघा हुई कि
स्वयं की अधिक वाहवाही से हारा।
दुआ में हजारों उठे हाथ तब जब
मुकद्दर भी मेरे इलाही से हारा।

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