geet by dr Ranjan Vishada

कह रहीं हैं जहाँ की कथाएँ सभी,
विश्व झुकता रहा प्यार के सामने।
क्या कुटी, क्या महल टिक न पाये कोई,
बह गये प्रीति की धार के सामने।

ज़िन्दगी के क्षितिज पर कभी भोर में,
फूटती चाह की जब लजीली किरन।
बस्तियाँ छोड़कर वन में मीलों तलक,
चौकड़ी भरने लगता है मन का हिरन।

पाँखुरी बन के बिछते रहे हैं हृदय,
प्रिय चितवन के अधिकार के सामने।

रूप पर मुग्ध होकर तपस्वी डिगे,
बादशाहों ने भी गद्दियाँ छोड़ दीं।
रोकने के लिए दो दिलों का मिलन,
जो भी जंज़ीरे बाँधी गयी तोड़ दीं।

हारती ही रही हर हनक, हर खनक,
मस्त पायल के झंकार के सामने।

जब विधाता ने खुद प्यार बाँटा यहाँ,
हर नगर, हर डगर, हर सड़क, हर गली,
उसकी मुस्कान की ही मदिर गंध से,
है सुगन्धित लता हर सुमन हर कली।

फिर भला शूल बोता है राहों में क्यों,
प्रश्न मेरा है संसार के सामने?

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