#Geet by Devesh Dixit

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, पर आधारित एक गीत

 

 

 

रूठ जाती है तक़दीर भी आपसे, फेंक देते हो नालों में जब बेटियाँ ,

दोष कुछ भी नहीँ और लाचार हैं, फ़िर भी कूड़ों में क्यों बेसबब बेटियाँ ।

 

घर ज़मी सौंप देंगे ये बेटों को हम, बेटियाँ कितना ससुराल ले जायेंगी ,

चार दिन की ये मेहमान हैं आपकी, यादें कितनी सुहानी ये दे जायेंगी ।

जब बुढ़ापे में बेटे नहीँ पूछते, याद आतीं हैं रो-रोके तब बेटियाँ ।

रूठ जाती है तक़दीर भी आपसे, फेंक देते हो नालों में जब बेटियाँ ।

 

बेटियाँ सब इनायत हैं भगवान की, लक्ष्मी शारदा और भवानी हैं ये ,

साइना भी हैं ये, इंदिरा भी हैं ये, कल्पना और लता की कहानी हैं ये ।

हक़ इन्हें भी मिले एक जैसा अगर, पीछे बेटों से रहतीं हैं कब बेटियाँ ।

रूठ जाती है तक़दीर भी आपसे, फेंक देते हो नालों में जब बेटियाँ ।

 

आपका खून हैं आपकी बेटियाँ, ये परायी अमानत हैं घर आपके,

रूखी सूखी भी खा कुछ कहेंगी नहीँ, कोई बोझा नहीँ हैं ये सर आपके ।

पुत्र करते हैं ज़िद उम्र भर आपसे, खोलती ही कहाँ हैं ये लब बेटियाँ ।

रूठ जाती है तक़दीर भी आपसे, फेंक देते हो नालों में जब बेटियाँ ।

देवेश दीक्षित कायमगंज 9794778813

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