# Geet by Dr Mohan Tiwari

किसको कैसे समझा पाऊँ,
जीवन पथ की बात।
जरा सा दिवस,जरा सी रात।

लोग हठी ह,ैं बात न मानें,
खुद को खुद परमेश्वर जानें।
सच्चाई को झूठा समझें,
घातों पर प्रतिघात। जरा सा दिवस…,

कहने की तो मजबूरी है,
बिना कहे कैसे बतलाऊँ।
किन्तु न वे सुनने को राजी,
बिना सुने कैसे समझाऊँ।
कहा-सुनी की आपा-धापी,
बन बैठी सहमात। जरा सा दिवस…,

सुनो प्रेम से,करो मोहब्बत,
ये जीवन का सार।
प्रेम,नेह,धीरज,सुचिता ही
जीवन का आधार।
बिना सुने कैसे समझोगे,
आदर्शोंं की बात।
जरा सा दिवस, जरा सी रात।।

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