#Geet by Gayaprasad Mourya Rajat

गीत

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मेरी एक चली होती तो,

मैं सबसे कह देता।

पुरवा चलती पछुआ बहती,

मैं मौसम संग बह लेता।

तेरे अंगों की मदमाती आहट को सुन सुन कर,

कोई नया गीत रच लेता साँसों को चुन चुन कर।

बक़्त हाथ से निकल गया ज्यों रेत बहा मुट्ठी से।

उजड़ गया वो घरपतुआ भी खड़ा किया मिट्टी से।

नदी बही जिस अभिलाषा से,

मैं भी तो बह लेता,

मेरी एक चली होती तो,

मैं सबसे कह देता।

आँगन आँगन खड़े कर दिए झूठे दंभी पहरे।

आसमान में उड़ते पंछी  सागर तल पर ठहरे।

केवल आभासी धारा थी पर में छोड़ दी किसने।

नाज़ुक संबंधों की डोरी हाथों से तोड़ दी किसने।

सागर तेरा साथ निभाता,

मैं तटबंधों सा ढह लेता।

मेरी एक चली होती तो,

मैं सबसे कह देता।

रमा रमा कर धूनी मैंने तन को खूब तपाया।

अंतर की जलती ज्वाला को कब कब किसे दिखाया।

भरी भीड़ सी बिछड़ गया मैं जैसे उल्कापात।

गगन धरा के बीच लटक कर क्या करता उत्पात।

अपना कह कर छोड़ दिया यों,

क्यों चुप चुप सह लेता ।

मेरी एक चली होती तो,

मैं सबसे कह देता।

रजत-आगरा

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